Karnataka High Court: X और भारत सरकार के बीच ऑनलाइन कंटेंट हटाने को लेकर चल रहा विवाद अब फिर से कोर्ट पहुंच गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने 10 मार्च को X Corp की उस अपील पर सुनवाई करने की मंजूरी दे दी है, जिसमें कंपनी ने सरकार की कंटेंट हटाने की शक्तियों को चुनौती दी है।
X और केंद्र सरकार के बीच कंटेंट हटाने को लेकर विवाद बढ़ गया है। कर्नाटक HC ने X Corp की अपील पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी कर सरकार से जवाब मांगा है।
दरअसल, X Corp ने अदालत से कहा है कि सरकार Information Technology Act 2000 और उससे जुड़े नियमों का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया कंपनियों को पोस्ट हटाने के आदेश दे रही है। कंपनी का कहना है कि कई बार यह प्रक्रिया कानून में तय आधिकारिक तरीके से अलग होती है।
कब का है यह मामला?
यह मामला उस पुराने फैसले से जुड़ा है, जिसमें हाई कोर्ट ने पहले X Corp की याचिका खारिज कर दी थी। 24 सितंबर को जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए सरकार के Sahyog पोर्टल को वैध बताया था। अब X Corp ने उसी फैसले के खिलाफ दोबारा अपील दायर की है। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस सी एम पूनाचा की डिवीजन बेंच कर रही है। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 11 जून तय की है।
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कंपनी ने क्या लगाया आरोप
X Corp का कहना है कि Sahyog पोर्टल के जरिए देशभर के अलग-अलग सरकारी अधिकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट हटाने के निर्देश भेज रहे हैं। कंपनी का आरोप है कि कई बार ये आदेश IT Act में तय आधिकारिक ब्लॉकिंग प्रक्रिया से बाहर दिए जाते हैं। कंपनी ने अदालत में यह भी बताया कि सरकार की तरफ से कंटेंट हटाने के कितने बड़े पैमाने पर अनुरोध आते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत सरकार ने X को 29,118 कंटेंट हटाने के अनुरोध भेजे थे। इनमें से कंपनी ने 26,641 मामलों में कार्रवाई की।
X Corp का कहना है कि IT Act की धारा 79(3)(b) और IT Rules के Rule 3(1)(d) का इस्तेमाल करके एक ऐसा सिस्टम बनाया जा रहा है जो कंपनी के अनुसार गैरकानूनी समानांतर सेंसरशिप सिस्टम जैसा है। कंपनी का तर्क है कि इससे धारा 69A के तहत तय कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सकता है।
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कंपनी का कहना है कि भारत में ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉक करने का सही और कानूनी तरीका सिर्फ IT Act की धारा 69A और 2009 के Blocking Rules के तहत ही होना चाहिए। इसी व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम Union of India (2015) केस में सही माना था।
