Job Transformation: बेंगलुरु में आयोजित फ्यूचर ऑफ वर्क समिट में एआई को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। जहाँ एक तरफ उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने तकनीकी बदलाव के कारण 50 प्रतिशत नौकरियों पर खतरे की घंटी बजाई, वहीं सरकारी अधिकारियों और उद्योग जगत के दिग्गजों ने इसे विनाश के बजाय विकास की एक प्रक्रिया बताया है। इससे मैसेज साफ है कि काम करने का तरीका बदलेगा, लेकिन काम खत्म नहीं होगा।
बदल रहा है काम का अंदाज…पुरानी स्किल बेकार, नई काबिलियत ही देगी रफ्तार। जानिए एक्सपर्ट का क्या है कहना?
पुराने हुनर की विदाई, नए कौशल स्वागत
कर्नाटक सरकार की आईटी सचिव एन. मंजुला का कहना है कि एआई के गहरे होते प्रभाव से कुछ पारंपरिक भूमिकाएं निश्चित रूप से खत्म होगी।लेकिन यह केवल तस्वीर का एक पहलू है। असल कहानी उन नई भूमिकाओं के इर्द-गिर्द बुनी जा रही है जो आज अस्तित्व में ही नहीं हैं। यह एक ऐसा विकासवादी चरण है जहाँ तकनीक पुराने बोझ को हटाकर भविष्य की उच्च-स्तरीय नौकरियों के लिए रास्ता बना रही है।
कोडिंग का अंत या ‘सुपर-वर्कर्स’ का जन्म
क्वेस कॉर्प के सीईओ लोहित भाटिया ने एक कड़वी लेकिन जरूरी सच्चाई की ओर इशार करते हुएा कहा आज की आधी नौकरियां, विशेषकर एंट्री-लेवल कोडिंग, कल प्रासंगिक नहीं रहेंगी। हालांकि, उन्होंने इसे एक अवसर के रूप में देखा। उनका मानना है कि हम ट्रांजेक्शन से ट्रांसफॉर्मेशन की ओर बढ़ रहे हैं। अब कंपनियां भारत से केवल काम पूरा करने की नहीं,भारतीय पेशेवर की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से डिजाइन और ऑप्टिमाइज करने की जिम्मेदारी उठा ली है।
रटंत विद्या से ‘बौद्धिक संपदा की ओर
आईटी क्षेत्र का परिदृश्य अब बदल चुका है। अब पारंपरिक सेवा कंपनियों के बजाय एंटरप्राइज टेक टीमें और प्रोडक्ट कंपनियां टैलेंट को अपनी ओर खींच रही हैं। यह बदलाव भारत को बैक ऑफिस की छवि से बाहर निकालकर ‘बौद्धिक संपदा’ निर्माता बनाने की ओर ले जा रहा है। अब फोकस इस पर है कि हम अपनी तकनीक खुद कितनी बेहतर बना सकते हैं।
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स्किलिंग का कर्नाटक मॉडल
भविष्य की इस चुनौती से निपटने के लिए कर्नाटक सरकार ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के माध्यम से एक मजबूत सुरक्षा चक्र तैयार कर रही है। एआई और बायोटेक को मिलाकर से उच्च शिक्षा के सिलेबस में एआई को शामिल करने तक की है। सरकार का लक्ष्य युवाओं को केवल डिग्री धारक नहीं, बल्कि इंडस्ट्री-रेडी बनाना है।
बेंगलुरु से आगे और गिग इकोनॉमी का विस्तार
भविष्य का कार्यबल केवल बेंगलुरु की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। सरकार अब कंपनियों को राज्य के अन्य हिस्सों में जाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जहाँ लागत 15 प्रतिशत तक कम है। इसके साथ ही, फ्रीलांस और ऑन-डिमांड काम को भी औपचारिक पहचान मिल रही है। लोहित भाटिया ने तो यहाँ तक संकेत दिया कि हम 10-मिनट जॉब्स के दौर की ओर बढ़ रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो रोजगार के पुराने प्रक्रिया ध्वस्त हो जाएंगे।
एआई से डरने के बजाय उसे एक टूल की तरह इस्तेमाल करना ही सफलता की कुंजी है।यह समय घबराने का नहीं, बल्कि खुद को फिर से तैयार करने की है।
