Stablecoin vs banks: अमेरिका में Digita Currency को लेकर नई बहस छिड़ गई है। White Houseऔर बैंकिंग सेक्टर के बीच मतभेद साफ दिख रहे हैं। बैंकों ने व्हाइट हाउस के Stablecoin पर सोच का विरोध किया है। उन्होंने जमा राशि के बाहर जाने के जोखिम की चेतावनी दी। और कहा है कि जैसे-जैसे यील्ड-बेयरिंग डिजिटल डॉलर पर बहस तेज़ हो रही है, नीति-निर्माता गलत मुद्दे पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
Stablecoin को लेकर अमेरिका में नई बहस तेज, बैंक और सरकार के बीच बढ़ा टकराव, जानें पूरा मामला और इसके पीछे की सरकार की मंशा।
डिपॉजिट खिसकने का डर
बता दें कि आर्थिक सलाहकारों की परिषद CEA की एक हालिया रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि स्टेबलकॉइन पर ब्याज पर प्रतिबंध लगाने से बैंक ऋण देने पर बहुत कम असर पड़ेगा। वहीं, सरकार इसे बड़ा जोखिम नहीं मान रही है। लेकिन अमेरिकन बैंकर्स एसोसिएशन सरकार की इस सोच से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि असली सवाल यह नहीं है कि ब्याज रोकने से क्या होगा। अगर स्टेबलकॉइन पर रिटर्न मिलने लगे तो फिर क्या होगा। ऐसा हुआ तो लोग अपने पैसे बैंक से निकाल सकते हैं। यही तो असली चिंता का विषय है।
लेंडिंग पर पड़ सकता है असर
अगर बैंकों के पास डिपॉजिट कम हो गए तो उनके लिए लोन देना मुश्किल हो सकता है। उन्हें महंगे स्त्रोतों से फंड जुटाना पड़ेगा। फिर ग्राहकों को रोकने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा। दोनों ही परिस्थिति में स्थानीय स्तर पर ऋण देने की उनकी क्षमता कम हो सकती है। आम लोगों को बिजनेस के लिए लोन लेना मंहगा हो सकता है। प्रकाशित CEA रिपोर्ट में पाया गया कि स्टेबलकॉइन ब्याज पर रोक लगाने से बैंक ऋण देने में केवल 2.1 बिलियन डॉलर, या लगभग 0.02 प्रतिशत की वृद्धि होगी।
सरकार और बैंकिंग समूह का क्या है तर्क
वही, सरकार का कहना है कि स्टेबलकॉइन पैसा सिस्टम से बाहर नहीं ले जाते हैं। यह सिर्फ पैसे का एक जगह से दूसरे जगह ट्रांसफर होता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे सरकारी बॉन्ड या दूसरे बैंकों में। इसलिए इसका असर बहुत कम रहेगा। वहीं, बैंकिंग समूहों का तर्क है कि यह पुनर्वितरण हानिरहित नहीं है। वे चेतावनी देते हैं कि जैसे-जैसे स्टेबलकॉइन 1–2 ट्रिलियन डॉलर के संभावित बाज़ार की ओर बढ़ेंगे, जोखिम भी उतने ही बढ़ेंगे। इससे छोटे-छोटे बैंक ज्यादा दबाव में आ सकते हैं।
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नया नैरो बैंकिंग मॉडल
बैंकों द्वारा उठाया गया एक और मुख्य मुद्दा यह है कि स्टेबलकॉइन प्रणाली को नैरो बैंकिंग मॉडल की ओर धकेल सकते हैं। जहाँ जमा राशि पूरी तरह से समर्थित होती है। लेकिन सक्रिय रूप से ऋण के रूप में नहीं दी जाती है। इससे अर्थव्यवस्था में क्रेडिट की उपलब्धता घट सकती है। वहीं, सरकार यह मानती है कि स्टेबलकॉइन कई फ़ायदे देते हैं, जैसे कि तेज़ ग्लोबल पेमेंट और कम जोखिम वाली एसेट्स से जुड़े रिटर्न तक पहुँच। बैंकिंग समूह इससे सहमत नहीं हैं।
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कानून बनाने की को लेकर बहस
अब यह मुद्दा कानून तक पहुंच गया है। CLARITY Act जैसे प्रस्तावों पर चर्चाए हो रही हैं। ये प्रस्ताव तय करेंगे कि स्टेबलकॉइन पर यील्ड जैसे इनामों की अनुमति दी जाए या नहीं दी जाए। यह फैसला पूरी तरह फाइनेंशिलयल दुनियां को बदलकर रख सकता है। लेकिन इसका असली असर तब दिखेगा जब यह तकनीक बड़े स्तर पर लागू होगी।
