India Economic Survey: भारत के आर्थिक सर्वेक्षण FY26 में इस बार एक बड़े सामाजिक और डिजिटल मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई गई है। सर्वे ने सीधे तौर पर सोशल मीडिया बैन की सिफारिश नहीं की, लेकिन उम्र के आधार पर उपयोग सीमित करने, सख्त उम्र सत्यापन, ऑटो फाइनेंसिंग फीचर्स पर रोक और बच्चों को दिखाए जाने वाले टारगेटेड विज्ञापनों पर नियंत्रण जैसे कदम सुझाए हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण FY26 में बच्चों और युवाओं में बढ़ती सोशल मीडिया लत पर चिंता जताई गई है। सरकार ने सख्त एज वेरिफिकेशन, टारगेटेड विज्ञापनों पर रोक और डिजिटल सुरक्षा बढ़ाने जैसे कदम सुझाए हैं।
बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया का असर
संसद में पेश रिपोर्ट के मुताबिक, कम उम्र के यूजर सोशल मीडिया की लत और गलत कंटेंट के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। सर्वे में बताया गया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम को एंग्जायटी, डिप्रेशन, साइबर बुलिंग, पढ़ाई में गिरावट और भविष्य की कमाई की क्षमता घटने से जोड़ा जा रहा है।
दुनिया के कई देश उठा चुके हैं सख्त कदम
भारत की यह सोच वैश्विक रुझान से जुड़ी है। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने वाला कड़ा कानून बनाया है। नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर AUD 50 मिलियन तक जुर्माना लग सकता है। फ्रांस भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
इसके अलावा ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस जैसे देश भी ऐसे कानूनों पर विचार कर रहे हैं। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि दुनिया भर की सरकारें अब इस बात को मानने लगी हैं कि कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोज़र से मानसिक स्वास्थ्य और उत्पादकता पर नकारात्मक असर पड़ता है।
भारत के लिए चुनौती क्यों बड़ी है
भारत में करीब 35 करोड़ सोशल मीडिया यूजर हैं, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की मानी जाती है। सर्वे के अनुसार, कई किशोर रोज 6 से 7 घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं। इससे भावनात्मक तनाव, साइबर फ्रॉड का खतरा, पढ़ाई का नुकसान और भविष्य की कार्यक्षमता में कमी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। वहीं, दूसरी तरफ देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है।
FY23 में इसका योगदान GDP का 11.74% था, जो FY25 तक 13.42% तक पहुंचने का अनुमान है। यानी एक तरफ डिजिटल ग्रोथ है, तो दूसरी तरफ उसके सामाजिक दुष्प्रभाव और दोनों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।
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विशेषज्ञों ने पूरी तरह बैन पर जताई चिंता
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अचानक पूरी तरह रोक लगाना नुकसानदायक हो सकता है। KPMG इंडिया के नारायणन रामास्वामी ने चेताया कि अचानक प्रतिबंध से किशोरों में ‘डिजिटल विड्रॉल’ जैसे लक्षण दिख सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों का भी कहना है कि अगर स्क्रीन टाइम शारीरिक खेल और असली दुनिया के संपर्क की जगह ले ले, तो दिमागी विकास प्रभावित हो सकता है।
Monk Entertainment के CEO विराज शेट ने कहा कि अगर बच्चों को बड़े प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया तो वे इंटरनेट के और ज्यादा असुरक्षित हिस्सों में जा सकते हैं। उन्होंने बैन की जगह बेहतर पैरेंटल कंट्रोल, प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और डिजिटल साक्षरता बढ़ाने की जरूरत बताई।
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सोशल मीडिया कंपनियों का पक्ष
Meta ने कहा है कि वह पहले से 13 साल से कम उम्र के बच्चों को प्लेटफॉर्म पर आने से रोकता है और टीनएजर्स के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करता है। कंपनी का मानना है कि सिर्फ सोशल मीडिया ऐप्स को निशाना बनाना काफी नहीं होगा क्योंकि किशोर कई तरह के डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करते हैं।
