Digital Green AI: डिजिटल ग्रीन ट्रस्ट भारत के किसानों को तकनीक से जोड़ने के मिशन पर काम कर रहा है। इसका लक्ष्य यह है कि आधुनिक तकनीक के फायदे गांवों और खेतों तक सीधे पहुंचें। यह संगठन जमीनी स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं के साथ मिलकर किसानों की समस्याओं को समझता है और उनके लिए सरल डिजिटल समाधान तैयार करता है।
डिजिटल ग्रीन ट्रस्ट की पहल दिखाती है कि कैसे तकनीक, SHG और FPO के सहयोग से किसानों की रोजमर्रा की खेती से जुड़ी समस्याओं का आसान समाधान बन सकती है।
कैसे हुई डिजिटल ग्रीन की शुरुआत
डिजिटल ग्रीन की यात्रा 2006 में एक रिसर्च प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई थी। उस समय यह जानने की कोशिश की जा रही थी कि तकनीक छोटे और सीमांत किसानों की मदद कैसे कर सकती है। शुरुआत में यह सिर्फ एक प्रयोग था, लेकिन जल्द ही यह साफ हो गया कि अगर स्थानीय अनुभव और आसान डिजिटल टूल्स को साथ लाया जाए, तो इसमें बड़ा बदलाव संभव है। इसी सोच के साथ 2008 में भारत में डिजिटल ग्रीन ट्रस्ट की औपचारिक स्थापना हुई। यह Microsoft रिसर्च से निकलने वाला भारत का पहला NGO बना।
पहले की सोच
डिजिटल ग्रीन की काम करने की शैली की सबसे बड़ी खासियत उसका ‘कम्युनिटी फर्स्ट’ मॉडल है। संगठन उन संस्थाओं के साथ काम करता है जिन पर गांवों में पहले से भरोसा है। इनमें स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन, फ्रंटलाइन वर्कर्स, कम्युनिटी आधारित संगठन और NGO शामिल हैं। डिजिटल ग्रीन इन नेटवर्क्स को तकनीक से मजबूत करता है, ताकि वह छोटे और सीमांत किसानों तक बेहतर तरीके से पहुंच सकें। खासतौर पर महिलाओं, आदिवासी किसानों और कम पढ़े-लिखे किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर समाधान तैयार किए जाते हैं।
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क्या है FarmerChat ऐप?
डिजिटल ग्रीन की इस पूरी पहल का केंद्र है FarmerChat ऐप। यह एक AI आधारित ऐप है, जिसे किसानों की रोजमर्रा की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। FarmerChat एक हाइपरलोकल, मल्टीलिंगुअल और मल्टी मॉडल प्लेटफॉर्म है। किसान अपनी भाषा में और अपनी सुविधा के अनुसार आवाज, टेक्स्ट, फोटो या वीडियो के जरिए जानकारी और सलाह पा सकते हैं।
इस ऐप में वॉइस फर्स्ट फीचर्स हैं, जिससे पढ़ने-लिखने में दिक्कत झेलने वाले किसान भी आसानी से इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। कम इंटरनेट वाले इलाकों के लिए इसमें पहले से कंटेंट सेव करने की सुविधा दी गई है। SHG और FPO जैसे समूह किसानों को ऐप से जोड़ने और भरोसा बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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असर और पहुंच
FarmerChat ने पारंपरिक कृषि सलाह प्रणालियों की तुलना में लागत को काफी कम किया है। तकनीक आधारित होने के कारण यह तेजी से बड़े स्तर पर फैल सका है। भारत में अब तक इस प्लेटफॉर्म से 3.5 लाख से ज्यादा किसान और फ्रंटलाइन वर्कर्स जुड़ चुके हैं, जिनमें करीब 35 प्रतिशत महिलाएं हैं।
सबसे अहम बात यह है कि 60 प्रतिशत एक्टिव यूजर्स ने बताया है कि वे ऐप से मिली सलाह को अपनाते हैं। प्लेटफॉर्म में फीडबैक की व्यवस्था भी है, जिससे सलाह हमेशा खेत की हकीकत से जुड़ी रहती है। FarmerChat जैसी पहल यह साबित करती है कि जब तकनीक को समुदाय के भरोसे के साथ जोड़ा जाता है, तो किसानों की जिंदगी में बड़ा और सकारात्मक बदलाव संभव है।
