ADA Website Accessibility : अमेरिका में वेबसाइट को दिव्यांग लोगों के लिए आसान बनाना कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। 2025 में Americans with Disabilities Act (ADA) से जुड़े संघीय वेबसाइट एक्सेसिबिलिटी मामलों में 46% मुकदमे ऐसी कंपनियों के खिलाफ थे, जिन पर पहले भी केस हो चुका था। UsableNet के अनुसार, 2025 में अमेरिका की संघीय और राज्य अदालतों में वेबसाइट एक्सेसिबिलिटी से जुड़े 5,000 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हुए। इनमें 1,427 मामले, यानी एक चौथाई से ज्यादा, ऐसी कंपनियों के खिलाफ थे जिनके खिलाफ पहले भी एक्सेसिबिलिटी का मामला दर्ज हो चुका था।
वेबसाइट में एक बार बदलाव करना काफी नहीं है। जानिए ADA एक्सेसिबिलिटी केस क्यों बढ़ रहे हैं, ई-कॉमर्स कंपनियां ज्यादा निशाने पर क्यों हैं और एआई से नई चुनौतियां कैसे बढ़ी हैं।
एक मुकदमा खत्म होने के बाद दूसरा केस क्यों?
कंपनी किसी मुकदमे का समझौता कर सकती है। शिकायत में बताई गई समस्याओं को ठीक भी किया जा सकता है, लेकिन इससे पूरी वेबसाइट हमेशा के लिए एक्सेसिबल नहीं हो जाती। वेबसाइट लगातार बदलती रहती है, नए पेज जुड़ते हैं, चेकआउट में बदलाव होता है, नए फीचर आते हैं और दूसरी कंपनियों के टूल भी वेबसाइट में जोड़े जाते हैं। ऐसे में एक बार की गई जांच कुछ समय बाद पुरानी पड़ सकती है, इसलिए वेबसाइट की लगातार जांच, नया कोड जोड़ते समय एक्सेसिबिलिटी की जांच और विशेषज्ञों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
करीब आधे संघीय मुकदमे दोबारा निशाने पर आई कंपनियों के खिलाफ
Seyfarth Shaw के ADA Title III आंकड़ों के अनुसार, 2025 में संघीय अदालतों में वेबसाइट एक्सेसिबिलिटी के 3,117 मुकदमे दर्ज हुए। 2024 में यह संख्या 2,452 थी। यानी एक साल में मामलों में 27% की बढ़ोतरी हुई। न्यूयॉर्क में सबसे ज्यादा 1,021 मामले दर्ज हुए। फ्लोरिडा में यह संख्या 2024 के मुकाबले लगभग दोगुनी होकर 961 पहुंच गई। इन मुकदमों का बड़ा हिस्सा कुछ सक्रिय शिकायतकर्ताओं और कानून फर्मों से जुड़ा है। करीब 20 से 25 सक्रिय शिकायतकर्ता और सबसे ज्यादा मामले दर्ज करने वाली 10 प्रमुख कानून फर्म लगभग 84% मामलों से जुड़ी हैं।
पिछले मुकदमे का रिकॉर्ड अदालतों में सार्वजनिक रहता है। इससे किसी कंपनी की वेबसाइट पर पहले सामने आई समस्याओं की जानकारी मिल सकती है। अगर कंपनी ने पहला मामला सुलझाने के बाद सिर्फ शिकायत में बताए गए पेज ठीक किए, तो वेबसाइट के दूसरे हिस्सों में नई समस्याएं रह सकती हैं।
ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर ज्यादा मामले क्यों?
ऑनलाइन खरीदारी वाली वेबसाइटों पर एक्सेसिबिलिटी का खतरा ज्यादा दिखाई देता है। accessiBe की ई-कॉमर्स ट्रेंड्स रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में 70% ADA वेबसाइट एक्सेसिबिलिटी मुकदमे ई-कॉमर्स वेबसाइटों से जुड़े थे। ऑनलाइन खरीदारी में ग्राहक पहले प्रोडक्ट देखता है। फिर उसे कार्ट में डालता है और आखिर में भुगतान करता है। इन सभी चरणों को आसानी से जांचा जा सकता है। अगर कोई ग्राहक स्क्रीन रीडर की मदद से वेबसाइट चला रहा है और वह चेकआउट पूरा नहीं कर पाता, तो कंपनी को दो तरह का नुकसान हो सकता है। एक तरफ कानूनी परेशानी का खतरा है। दूसरी तरफ बिक्री भी छूट सकती है। अमेरिका की टॉप 500 ई-कॉमर्स कंपनियों में 35.8% को 2025 में कम से कम एक मुकदमे का सामना करना पड़ा।
एक बार टूल लगाने से वेबसाइट सुरक्षित क्यों नहीं रहती?
कई कंपनियां एक्सेसिबिलिटी टूल लगाने के बाद मान लेती हैं कि काम पूरा हो गया, लेकिन वेबसाइट पर बदलाव लगातार होते रहते हैं। उदाहरण के लिए, किसी कंपनी ने आठ महीने बाद नया चेकआउट पेज बनाया। मार्केटिंग टीम ने नई अभियान वेबसाइट तैयार की। किसी बाहरी कंपनी ने चैट टूल में नया बदलाव कर दिया। ये चीजें उस समय मौजूद नहीं थीं, जब पहली बार वेबसाइट की जांच हुई थी। इसलिए नई समस्याएं बाद में पैदा हो सकती हैं। लाइव वेबसाइट की लगातार निगरानी जरूरी है। साथ ही, नया कोड वेबसाइट पर आने से पहले उसकी जांच होनी चाहिए। कुछ समस्याएं ऐसी भी होती हैं जिन्हें तकनीकी उपकरण अपने आप नहीं पकड़ पाते। उनके लिए विशेषज्ञों की समीक्षा जरूरी है।
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समझौता पूरी वेबसाइट की गारंटी नहीं देता
अदालत में हुआ समझौता आमतौर पर शिकायत में बताई गई समस्याओं पर केंद्रित होता है। यह पूरी वेबसाइट की जांच नहीं होता। मामला खत्म होने के बाद भी कंपनी का काम चलता रहता है। मार्केटिंग टीम नए पेज बनाती है। प्रोडक्ट टीम नए फीचर जोड़ती है। बाहरी कंपनियां चैट, विज्ञापन और दूसरी सेवाओं के लिए नए उपकरण जोड़ती रहती हैं। इन बदलावों से नई एक्सेसिबिलिटी समस्याएं पैदा हो सकती हैं, इसलिए एक कंपनी का पुराना मुकदमा खत्म होने के बाद भी वेबसाइट दोबारा कानूनी जोखिम में आ सकती है।
वेबसाइटों में एक्सेसिबिलिटी समस्याएं बढ़ क्यों रही हैं?
WebAIM ने फरवरी 2026 में दुनिया की टॉप 10 लाख वेबसाइटों के होमपेज की जांच की। इसमें पाया गया कि 95.9% वेबसाइटों में WCAG 2.x से जुड़े ऐसे दोष थे जिन्हें जांच में पहचाना जा सकता था। एक साल पहले यह आंकड़ा 94.8% था। यानी स्थिति में सुधार के बजाय गिरावट दिखी। हर होमपेज पर औसत त्रुटियों की संख्या भी 10.1% बढ़ी। करीब पांच साल में पहली बार ऐसा हुआ जब इसमें कमी के बजाय बढ़ोतरी दर्ज हुई। WebAIM के अनुसार, वेबसाइटों का तकनीकी ढांचा लगातार जटिल हो रहा है। एक साल में औसत होमपेज पर कोड एलिमेंट्स की संख्या 22.5% बढ़ी। वहीं एआरआईए यानी Accessible Rich Internet Applications मार्कअप में 27% बढ़ोतरी हुई।
AI से भी बढ़ रही है चुनौती
वेबसाइट और डिजिटल सामग्री अब तेजी से तैयार हो रही है। इसमें AI का इस्तेमाल भी बढ़ा है, लेकिन इससे एक्सेसिबिलिटी को लेकर नई चिंता सामने आई है। AccessiBe और Qualtrics के 300 से ज्यादा ई-कॉमर्स लीडर्स के सर्वे में 78% ब्रांड्स ने बताया कि उनके 25% से ज्यादा कंटेंट अब एआई से तैयार होते हैं। वहीं, 82.5% ब्रांड्स को चिंता है कि एआई से तैयार कंटेंट ऐसी समस्याएं पैदा कर सकता है, जिन्हें वे आसानी से पहचान नहीं पाते। जिन ब्रांड्स पर पहले एक्सेसिबिलिटी से जुड़ी कानूनी कार्रवाई हो चुकी है, उनमें 65.4% ने एआई से तैयार कंटेंट को सबसे बड़ी चिंता बताया।
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मजबूत एक्सेसिबिलिटी व्यवस्था कैसी होनी चाहिए?
एक मजबूत व्यवस्था में तीन चीजें साथ चलनी चाहिए। पहली, लाइव वेबसाइट की लगातार जांच। दूसरी, नया फीचर या कोड वेबसाइट पर आने से पहले एक्सेसिबिलिटी जांच। तीसरी, ऐसी समस्याओं के लिए विशेषज्ञों की समीक्षा जिन्हें तकनीकी उपकरण नहीं पकड़ पाते। AccessiBe के सीईओ रॉबर्ट लोपेज ने भी कहा है कि एक्सेसिबिलिटी ऐसा काम नहीं है जिसे एक बार पूरा करके छोड़ दिया जाए। इसके लिए लगातार ध्यान, तय प्रक्रिया, तकनीकी जांच और इंसानी विशेषज्ञता की जरूरत होती है। AccessiBe का AccessWidget लाइव वेबसाइट को हर 24 घंटे में दोबारा जांचता है। AccessFlow डेवलपमेंट प्रक्रिया में नई एक्सेसिबिलिटी समस्याओं को पहचानने में मदद करता है। वहीं, AccessServices विशेषज्ञों की जांच, VPAT और सुधार की योजना जैसी सेवाएं देता है।
जापानी चॉकलेट कंपनी की अमेरिकी इकाई ROYCE’ Confect USA ने भी कानूनी दबाव के बाद ऐसा तरीका अपनाया। कंपनी ने अपने सोर्स कोड में सुधार के लिए accessFlow का इस्तेमाल किया। 8 हफ्तों में उसकी एक्सेसिबिलिटी स्कोर तीन गुना हुई और 1,000 मॉनिटर किए गए पेजों पर अलग-अलग समस्याएं 69% कम हुईं। इन आंकड़ों से साफ है कि वेबसाइट एक्सेसिबिलिटी का काम सिर्फ मुकदमा खत्म होने तक सीमित नहीं रह सकता। वेबसाइट लगातार बदलती है। इसलिए नियमित जांच, विकास के दौरान सावधानी और विशेषज्ञों की मदद को साथ लेकर चलना जरूरी है।
