Nvidia H200 पर चीन का ‘नो एंट्री’ आदेश, टेक इंडस्ट्री में हलचल

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Nvidia H200 पर चीन का ‘नो एंट्री’ आदेश, टेक इंडस्ट्री में हलचल
January 15, 2026

Nvidia H200: चीन और अमेरिका के बीच तकनीकी प्रभुत्व की लड़ाई एक बार फिर तेज होती नजर आ रही है। सूत्रों के अनुसार, चीनी कस्टम अधिकारियों को हाल ही में निर्देश दिए गए हैं कि Nvidia के H200 Artificial Intelligence चिप्स को चीन में प्रवेश की अनुमति न दी जाए। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब उन्नत AI चिप्स विश्व की राजनीति और सुरक्षा बहस के केंद्र में हैं। तो आइए जानते हैं आखिर इसके पीछे की पूरी कहानी।

घरेलू कंपनियों को चेतावनी

बताया जा रहा है कि चीनी सरकार ने देश की टेक कंपनियों को भी सतर्क किया है। मंगलवार को हुई बैठकों में कंपनियों से कहा गया कि अत्यंत आवश्यकता होने पर ही H200 चिप्स खरीदे जाएं। इससे साफ है कि बीजिंग आयात के साथ-साथ घरेलू मांग को भी नियंत्रित करना चाहता है।

H200 बना तनाव का प्रतीक

Nvidia का H200 चिप अत्याधुनिक तकनीक से लैस माना जाता है। इसी कारण यह अमेरिका- चीन तनाव का प्रतीक बन गया है। चीनी कंपनियों में इसकी मांग तो है, लेकिन सरकार घरेलू  Semiconductor उद्योग को बढ़ावा देने की रणनीति पर भी काम कर रही है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि यह सख्ती स्थायी है या अस्थायी दबाव की नीति। इसके पीछे की कोई और रणनीति।

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अमेरिकी मंजूरी, घरेलू विरोध

जानकारी के मुताबिक इसी सप्ताह अमेरिकी प्रशासन ने कुछ शर्तों के साथ H200 चिप्स के चीन को निर्यात की अनुमति दी थी। अमेरिका में कई नीति-निर्माता इसे सुरक्षा जोखिम मानते हैं और आशंका जताते हैं कि इससे चीन की सैन्य और AI क्षमताएं मजबूत हो सकती हैं।

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अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं

वहीं, इस मामले में चीनी अधिकारियों ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह कदम औपचारिक प्रतिबंध है या अस्थायी व्यवस्था। यह भी साफ नहीं है कि पहले से दिए गए ऑर्डर इस फैसले से प्रभावित होंगे या नहीं। इस मुद्दे पर आधिकारिक एजेंसियों और Nvidia की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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R&D को मिल सकती है राहत

कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि चीन सीमित छूट पर विचार कर रहा है। खासकर विश्वविद्यालयों और रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए विशेष परिस्थितियों में H200 चिप्स को मंजूरी दी जा सकती है। इससे चयनात्मक नियंत्रण की नीति के संकेत मिलते हैं।

कूटनीतिक दबाव की रणनीति

वहीं, विश्लेषकों इस घटनाक्रम को कूटनीतिक रणनीति मान रहे हैं। उनका कहना है कि अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की प्रस्तावित बीजिंग यात्रा से पहले चीन इस मुद्दे को वॉशिंगटन पर दबाव बनाने के औजार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

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