Smartphone Memory Loss : अगर आज आपसे हर हफ्ते बात करने वाले किसी व्यक्ति का मोबाइल नंबर पूछ लिया जाए, तो शायद आप तुरंत अपना फोन देखेंगे। ऐसा कब हुआ, पता ही नहीं चला। फोन पहले सिर्फ कॉल और मैसेज के काम आता था। अब धीरे-धीरे यह हमारी याददाश्त का भी बड़ा हिस्सा बन गया है। फोन में हमारे नंबर, जन्मदिन, अपॉइंटमेंट, पासवर्ड, खरीदारी की लिस्ट, फोटो, पता, बोर्डिंग पास और जरूरी कामों की जानकारी रहती है। कई बार हमें जानकारी खुद याद नहीं रहती। हमें सिर्फ इतना याद रहता है कि वह जानकारी फोन में कहां मिल सकती है। यानी अब हम जानकारी कम और उसका ठिकाना ज्यादा याद रखते हैं।
क्या स्मार्टफोन हमारी याददाश्त का नया ठिकाना बना है? जानिए कैसे फोन नंबर, रास्ते, पासवर्ड और पुरानी यादें अब मोबाइल में सिमट गई हैं।
रास्ता याद नहीं, लेकिन Google Maps जरूर याद है
GPS इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। पहले किसी जगह पर बार-बार जाने से रास्ता धीरे-धीरे याद हो जाता था। रास्ते में आने वाला फ्लाईओवर, पेट्रोल पंप या कोई खास दुकान पहचान बन जाती थी। कई बार कोई अनोखा निशान भी रास्ता याद रखने में मदद करता था। अब ऐसा जरूरी नहीं है। हम एक ही जगह पर कई बार जा सकते हैं और फिर भी Google Maps खोल लेते हैं। Maps लगातार बताता रहता है कि 300 मीटर बाद बाएं मुड़ें, दूसरा एग्जिट लें या सीधे चलते रहें। हम निर्देश मानते हुए मंजिल तक पहुंच जाते हैं, लेकिन रास्ता याद नहीं रहता। अगर बीच रास्ते में Maps अचानक बंद हो जाए, तो शायद हमें कुछ देर के लिए समझ ही न आए कि हम कहां हैं। पिछले 40 किलोमीटर में हमने रास्ते पर कितना ध्यान दिया, इसका भी अंदाजा नहीं होगा। सुविधा बढ़ी है, लेकिन रास्ता याद रखने की आदत कम हुई है।
जानकारी याद नहीं, उसका ठिकाना याद रहता है
यह बदलाव रोजमर्रा के कामों में भी दिखता है। कोई पता भेजता है तो हम उसे याद करने के बजाय सोचते हैं कि वह WhatsApp पर आया था। कोई जरूरी नंबर हो तो शायद ईमेल में मिल जाएगा। कुछ खरीदना हो तो उसका स्क्रीनशॉट ले लेते हैं। कोई आइडिया आए तो नोट्स में लिख देते हैं। कई बार जानकारी याद नहीं होती, लेकिन यह याद रहता है कि वह कहां मिली थी। हम सोचते हैं, ‘उसने मुझे भेजा था… शायद मंगलवार को… WhatsApp पर… उस फोटो के बाद।’ इसके बाद अपने ही फोन में उस जानकारी को ढूंढने की शुरुआत होती है।
पासवर्ड के साथ भी यही हुआ है। Password Manager की मदद से हमें दर्जनों मुश्किल पासवर्ड याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती। यह हर जगह एक ही आसान पासवर्ड रखने से बेहतर है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि याद रखने का एक और काम हमने फोन को दे दिया है।
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अब फोटो भी हमारी याददाश्त संभालती हैं
फोन ने फोटो लेने का तरीका भी बदल दिया है। पहले फोटो किसी खास पल को याद रखने के लिए ली जाती थी। अब कई बार हम फोटो इसलिए लेते हैं, ताकि हमें कोई चीज याद न रखनी पड़े।
- कार कहां पार्क की? फोटो ले ली।
- कौन सी दवा खरीदनी है? डिब्बे की फोटो ले ली।
- किसी सामान का मॉडल नंबर क्या है? लेबल की फोटो खींच ली।
- जरूरी कागज कहां रखा था? उसकी फोटो शायद काम आ जाए।
फोन में हजारों सामान्य तस्वीरें भी जमा होती रहती हैं। इनमें यात्राएं, खाना, परिवार, दोस्त और रोजमर्रा के छोटे-छोटे पल शामिल होते हैं। कई साल बाद फोन अचानक कोई पुरानी फोटो दिखाता है और हमें वह पल याद आ जाता है, जिसे हम लगभग भूल चुके थे। उस समय फोन सिर्फ फोटो नहीं दिखा रहा होता। वह हमारी एक पुरानी याद वापस ला रहा होता है।
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क्या फोन हमें भुलक्कड़ बना रहा है?
यह कहना आसान है कि स्मार्टफोन ने हमें आलसी और भुलक्कड़ बना दिया है, लेकिन बात इतनी आसान नहीं है। इंसान हमेशा से जानकारी अपने दिमाग के बाहर भी संभालता आया है। पहले लोग डायरी, एड्रेस बुक, कैलेंडर, नक्शे, फोटो एल्बम और छोटी-छोटी पर्चियों का इस्तेमाल करते थे। स्मार्टफोन ने बाहरी याददाश्त शुरू नहीं की। उसने बस बहुत सारी जानकारी को एक ऐसे डिवाइस में जमा कर दिया, जो लगभग हर समय हमारे साथ रहता है।
क्या हमें सच में 20 लोगों के फोन नंबर याद रखने की जरूरत है, जब फोन उन्हें आसानी से संभाल सकता है? शायद नहीं। उस समय और दिमाग का इस्तेमाल बातचीत या दूसरी जरूरी चीजों पर किया जा सकता है, लेकिन परेशानी तब होती है, जब हम उन चीजों को भी याद रखना बंद कर देते हैं जिन्हें हम सच में जानना चाहते हैं या फिर इसलिए ध्यान देना छोड़ देते हैं क्योंकि हमें लगता है कि फोन सब कुछ याद रख लेगा।
Maps, Contacts, Notes, Password Manager और फोन में जमा हजारों स्क्रीनशॉर्ट छोड़ना जरूरी नहीं है। इन चीजों ने जिंदगी आसान बनाई है। फिर भी कभी-कभी फोन देखने से पहले किसी जानकारी को खुद याद करने की कोशिश की जा सकती है। बस यह देखने के लिए कि हमारी असली याददाश्त अभी भी ठीक से काम कर रही है।
